भारत की सहिष्णु संस्कृति में इंडो-इस्लामिक संस्कृतियों का समन्वय (ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में)

 

प्रियांकी गजभिए

सहायक प्राध्यापक इतिहास, शास. डॉ. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर, स्नातकोत्तर महाविद्यालय,

डोंगरगांव, छत्तीसगढ़, भारत

*Corresponding Author E-mail: priyankirjn7910@gmail.com

 

ABSTRACT:

हर युग में इतिहास संस्कृतियों का साक्षी बना रहता है। उसके बीते कालखंडों में आती जाती संस्कृतियों के बीच वह तालमेल बिठाए रहता है । भारत को संस्कृतियों का अजायबघर कहा जाता है, क्योंकि इसकी संस्कृति की मूल भावना वसुधैव कुटुंबकम पर आधारित है । चीन ने अपनी सुरक्षा तथा बाह्य आक्रमणकारियों से बचाव हेतु 300 ईसा पूर्व अपनी सरहदों पर एक दीवार खड़ी कर दी जिसे चीन की महान दीवार कहा जाता है। परंतु भारत ने अपनी सरहदों को सदैव मुक्त रखा। यह प्राचीन भारतीय संस्कृति की मौलिक सोच है कि

 

सीखने की कोई सरहद नहीं

उत्साह हमेशा दिल से हो ।

 

ज्ञान जहां से मिले तुम

खोल दो सब खिड़कियां ।

 

जरूरी नहीं कि हर एक ज्ञान

गीता कुरान बाइबल से हो।

 

ऐसी समन्वयकारी भावनाओं से युक्त भारतभूमि में इस्लाम के आगमन पश्चात एक नवीन सांस्कृतिक समन्वय आरंभ होता है, जिसे इंडो-इस्लामिक संस्कृति कहा गया । इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान में दोनों ही धर्म एक दूसरे को प्रभावित करते हैं, तथा एक दूसरे से प्रभावित होते हैं। किंतु यह भारत में आए अन्य बाह्य आक्रमणकारियों जैसे ईरानी, यूनानी, शक, कुषाण के समान भारत की संस्कृति में समाहित नहीं हुए, अपितु दोनों संस्कृतियों के समन्वय सम्मिश्रण के बावजूद भी हिंदू तथा मुसलमान अपनी विशिष्टता आज तक बनाए रखे हैं। मध्यकालीन सूफी आंदोलन एवं भक्ति आंदोलन के संतो द्वारा हिंदुओं तथा मुसलमानों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिंदू यदि इस्लाम से प्रभावित हुए तो उन्होंने अनेक क्षेत्रों में उन्हें प्रभावित भी किया। टाइटस महोदय का यह कथन महत्वपूर्ण है कि -

 

’’सब कुछ कहने के बाद भी इसमें संदेह नहीं है कि हिंदू धर्म ने जो अभी तक अपने सुनिश्चित मार्ग पर आश्चर्यजनक आस्था एवं विश्वास के साथ अग्रसर है, इस्लाम के ऊपर, अपने इस्लामी प्रभाव की अपेक्षा, कहीं अधिक प्रभाव उत्पन्न किया था।’’

 

KEYWORDS: इंडो इस्लामिक संस्कृति, शक, कुषाण, जौहर प्रथा, बाल विवाह, हिंदवी-उर्दू, इंडो-सारसिनिक वास्तुकला, सूफीवाद, भक्तिकाल, सांस्कृतिक समन्वय, बहु विवाह, पर्दाप्रथा, कुरान, ऋग्वेद, अद्वैतवाद, एकेश्वरवाद, कव्वाली, कीर्तन, मूर्तिपूजा

 

 


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प्राचीन काल से भारतीय उपमहाद्वीप सांस्कृतिक विविधताओं से परिपूर्ण रहा है इसका कारण भारत के समृद्ध क्षेत्र पर अधिकार हेतु प्राचीन काल से ही विभिन्न आक्रांताओं जैसे यूनानी शक हूण कुषाणों का भारत पर अधिकार करना तथा यहां की संस्कृति तथा धर्म में समाहित हो जाना था। प्रत्येक आरंभिक आक्रांता सांस्कृतिक विभिन्नताओं से युक्त था किंतु प्राचीन सनातन धर्म में आत्मसात करने की सामर्थ्य ने उसे अपने साथ ही समाविष्ट कर लिया । किंतु मध्यकाल में अरब, तुर्क, अफगान आक्रमणकारियों को आत्मसात करने में असफल रहा । जहां आधुनिक काल में अंग्रेजों के आगमन से भारतीयों ने संस्कृति का पश्चिमीकरण भी स्वीकार किया किंतु हिंदू तथा इस्लाम ने कभी भी स्वयं को एक दूसरे के अनुरूप परिवर्तन का प्रयास नहीं किया । यद्यपि यह परिवर्तन तथा समन्वय हमें भारतीय इतिहास के एक अनोखे पहलू के रूप में कला, साहित्य, संगीत, वास्तुकला तथा अल्प रूप में धर्म में दिखता है जिसे गंगा -जमुनी तहजीब का नाम दिया जाता है । इस शोध पत्र में इस हिंदू तथा इस्लामी संस्कृति के समन्वय के विभिन्न रूपों तथा बाधाओं एवं चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया है। भारत में इंडो इस्लामिक संस्कृति ने एक नवीन समस्या, दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं के समन्वय की समस्या का जन्म हुआ । इस संबंध में डॉ. ताराचंद ने लिखा है -’’हिंदू धर्म, हिंदू कला हिंदू साहित्य तथा हिंदू विज्ञान ने मुस्लिम तत्वों को ग्रहण ही नहीं किया अपितु इससे हिंदू संस्कृति की भावना व मस्तिष्क की सामग्री भी परिवर्तित हो गई।’’

 

इसके विपरीत ई.बी.हैवल तथा प्रोफेसर शर्मा का मत है- ’’अपनी राजनीतिक दुर्बलता के बाद भी मध्ययुगीन भारत सांस्कृतिक दृष्टि से चैतन्य था वह उस वृक्ष के समान था जो उस व्यक्ति को भी छाया देता है जो उसकी शाखाएं काट डालता है ।राजनीतिक पराजय के बाद भी भारत ने अपना बौद्धिक साम्राज्य, जो उसे सर्वाधिक प्रिय था, बनाए रखा।’’

 

प्रारंभिक संपर्क और इस्लाम का आगमन (8वीं-12वीं शताब्दी):

इस्लाम का भारत में प्रवेश 8वीं शताब्दी में अरब व्यापारियों के माध्यम से सिंध (712 ईस्वी, मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व )में हुआ। बाद में, 11वीं-12वीं शताब्दी में तुर्की और अफगान शासकों (महमूद गजनवी, मुहम्मद गोरी) के आक्रमणों ने इस्लाम को उत्तरी भारत में स्थापित किया। सांस्कृतिक समन्वय के प्रारंभिक संकेत व्यापार और सामाजिक मेलजोल के रूप में मिलता है। अरब व्यापारियों और स्थानीय हिंदू समुदायों के बीच व्यापारिक संबंधों ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया। उदाहरण के लिए, गुजरात और मालाबार तट पर इस्लामी और हिंदू व्यापारियों के बीच सहयोग देखा गया। अरबी और फारसी शब्दों का स्थानीय भाषाओं (जैसे प्राकृत और अपभ्रंश) में प्रवेश शुरू हुआ। इस काल में समन्वय सीमित था, क्योंकि प्रारंभिक संपर्क मुख्य रूप से व्यापारिक और सैन्य स्तर पर था। महमूद गजनवी ने भारत में अनेक आक्रमण किया किंतु केवल पंजाब तथा सिंधु नदी के पार का क्षेत्र ही विजय कर सका ।मोहम्मद गौरी ने भारत विजय की दिशा में उपलब्धियां हासिल की। 10 वर्षों में मुल्तान, उच्छ तथा लाहौर को जीत लिया। 1192 में तराइन के द्वितीय युद्ध में दिल्ली तथा अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया। उसने अजमेर, बनारस, कन्नौज को भी जीता। कुतुबुद्दीन ऐबक तथा बख्तियार खिलजी ने विजय अभियान जारी रखा तथा 30 वर्षों में ही ब्रह्मपुत्र से लेकर सिंधु नदी तक का सारा उत्तर भारत मुसलमानों के अधीन आ गया। सल्तनत काल तथा मुगल काल तक भारत का विजय अभियान जारी रहा और संपन्न हुआ।

 

हिंदू मुस्लिम समन्वय का आरंभ:-

भारत विजय के पश्चात भारत आए पूर्व विदेशियों की तरह मुसलमान, तुर्क तथा अरब भारत भूमि में जब बस गए तथा जब वे हिंदुओं के संपर्क में आए तब यह स्वाभाविक था कि हिंदू समाज तथा संस्कृति से प्रभावित होते तथा हिंदू समाज तथा संस्कृति को प्रभावित करते। किंतु आश्चर्यजनक रूप से इन दो शक्तिशाली धर्म तथा संस्कृतियों ने मध्यकालीन भारतीय संस्कृति पर लंबे कालखंड तक कोई वास्तविक रचनात्मक प्रभाव नहीं डाला। अंग्रेजों तथा पाश्चात्य सभ्यता के संपर्क ने 19वीं शताब्दी में पुनर्जागरण को जन्म दिया किंतु मध्य युग में ऐसी कोई बात नहीं हुई। इसका कारण शायद यह था की अंग्रेजी शासन के आरंभिक दिनों में भारतीय, विशेष कर हिंदू पाश्चात्य सभ्यता की आश्चर्य जनक प्रगति से प्रभावित थे। इसके विपरीत उन्होंने मुसलमान तथा उनकी सभ्यता संस्कृति में ऐसे कोई गुण नहीं देखे। उनकी धर्मांधता तथा बर्बरता उन्हें उनसे दूर ही करती रही और वे उन्हें म्लेच्छ ही समझते रहे, मुसलमान भी हिंदुओं को काफिर कहते रहे। वे अपने धर्म तथा सभ्यता को हिंदुओं से निश्चित रूप से श्रेष्ठ समझते रहे। जदूनाथ सरकार का यह मत है कि ’’मुसलमानों ने अपने आप को पृथक रखने की बड़ी कोशिश की वह मक्का की ओर ही देखते रहे उन्होंने अपने कानून पृथक रखें उन्होंने शासनप्रथा, भाषा, साहित्य देवस्थान, संत पृथक ही रखें। वे भारत से बाहर अरब, सीरिया, मिश्र, ईरान को अपना समझते रहे।’’ भारत विजय का मुख्य उद्देश्य इस्लाम का प्रचार तथा धर्म परिवर्तन था इसलिए एक दूसरे के धर्म तथा संस्कृति के प्रति परस्पर ना कोई सहानुभूति उत्पन्न हुई ना ही कोई सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा सांस्कृतिक पुनरुत्थान हुआ। तथापि दोनों सभ्यताओं के सादियों के संपर्क नें एक दूसरे पर कुछ प्रभाव अवश्य डाला। वह केवल इसलिए कि वे एक ही देश में इतने समय तक साथ-साथ रहते रहे। वस्तुतः हिंदुओं तथा मुसलमानों को एक दूसरे से कुछ सीखने की उत्सुकता नहीं थी। भारत विजय के पश्चात मुसलमान शासको के समक्ष बहुसंख्यक हिंदुओं पर शासन करना हिंदुओं की सहायता के बिना अव्यवहारिक लगा । देश का आर्थिक जीवन हिंदुओं के हाथ में था । न्याय के कार्य में भी हिंदू पंडित ही मुसलमान न्यायाधीशों को समझा सकते थे कि कौन सा कानून किस मुकदमे में हिंदुओं पर लागू होता है। मुसलमान सुल्तानों को भारत के प्रशासन तथा मुसलमान अमीरों के विद्रोह को दबाने के लिए भी हिंदुओं की सहायता लेनी पड़ी। हिंदुओं ने भी मुस्लिम शासको के प्रति अपना रवैया बदला तथा उनसे समझौता करना ही ठीक समझा । इस तरह से हिंदुओं तथा मुसलमानों के सांस्कृतिक समन्वय का आरंभ होता है । जो कला, साहित्य, भाषा में अल्प परिवर्तन के रूप में मिलता है।

 

मुस्लिम संस्कृति का भारत में प्रभाव:-

भारत में मुस्लिम संस्कृति के आगमन से भारतीय हिंदू समाज दो तरह से प्रभावित हुआ। प्रथम मुसलमानों द्वारा हिंदुओं के धर्मांतरण हेतु कट्टर प्रयत्नों से हिंदुओं में रूढ़िवादिता और दृढ़ हो गई। इस्लाम से हिंदू धर्म तथा संस्कृति को बचाने का एकमात्र उपाय यही है कि दैनिक अचार-विचार तथा धार्मिक रीति रिवाज को इतना कठोर बना दिया गया जैसे वह कभी नहीं थे। माधव विश्वेश्वर तथा अन्य हिंदू विद्वानों ने हिंदुओं के लिए कठोर धार्मिक जीवन निर्धारित करते हुए नवीन ग्रंथ और भाष्य लिखें। मुस्लिम शासको एवं अधिकारियों से हिंदू स्त्रियों की रक्षा हेतु बाल विवाह, पर्दाप्रथा के नियम कठोर बना दिए गए । खान पान, विवाह तथा दैनिक आचार व्यवहार संबंधी बातें निश्चित कर दी गई। जोहरप्रथा, सतीप्रथा, कन्या वध की प्रथा उच्च वर्ग से निम्न वर्ग तक सर्वत्र प्रचलित हो गई।

 

इस्लाम का दूसरा प्रभाव यह पड़ा कि मुसलमान सामाजिक संगठन के कुछ जनवादी सिद्धांतों को हिंदुओं ने अपना लिया। हिंदू सुधारकों ने सभी हिंदू जातियों तथा वर्णों की एकता पर बल दिया तथा बताया कि मोक्ष प्राप्ति हेतु किसी जाति विशेष में जन्म लेना आवश्यक नहीं है। मुसलमानों के द्वारा हिंदुओं के धर्मांतरण ने हिंदू नेताओं तथा सुधारकों में यह चेतना जागृत कर दी कि हिंदू जाति की भलाई हेतु शूद्रों तथा अछूत जातियों के प्रति कुछ अधिक उदारतापूर्वक व्यवहार करना आवश्यक है । हिंदू समाज के उच्चवर्गीय लोगों के पहनावे, आहार- विचार तथा सामाजिक तौर- तरीकों में इस्लामी प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। अनेक विदेशी यात्रियों के विवरण से स्पष्ट होता है कि मुगल काल में हिंदू तथा मुसलमान भद्र लोग लगभग एक ही प्रकार के वस्त्र पहनते थे। घुटनों तक लंबा कबा, लंबी बाहों का कुर्ता पजामा, सफा या पगड़ी पुरुषों द्वारा धारण किया जाता था। हिंदू जनसाधारण में ब्राह्मण लोग इस्लाम से प्रभावित नहीं हुए उच्च वर्गीय हिंदू तथा शाही सेवारत हिंदू मुसलमानी मांसाहारी भोजनप्रथा पुलाव, बिरयानी, कबाब, कोफ्ता आदि खाद्य पदार्थों का उपयोग करने लगे थे। बहुतों ने तो मुस्लिम सामाजिक व दरबारी तौर तरीके, आचार व्यवहार तथा नमस्कार करने के ढंग भी अपना लिए थे।

 

हिंदू साहित्य पर प्रारंभ में मुसलमानी संपर्क का अल्प प्रभाव पड़ा। लगभग 300 वर्षों तक हिंदू ,अरबी तथा फारसी के अध्ययन से बचे रहे। सर्वप्रथम सिकंदर लोदी के काल में कुछ हिंदू फारसी पढ़ने लगे, इसलिए सल्तनत काल की हिंदी तथा संस्कृत की रचना शैली पर विशेष इस्लामी प्रभाव नहीं पड़ा। फिरोज तुगलक के काल में कुछ मुसलमान विद्वानों ने संस्कृति तथा अपभ्रंश की प्रेम कथाओं को हिंदी अनूदित किया। अकबर के काल से हिंदू तथा मुसलमान विद्वान एक दूसरे के संपर्क में आए। अकबर द्वारा स्थापित अनुवाद विभाग में हिंदू तथा इस्लामी साहित्य को एक आधार में ला खड़ा किया। शाहजहां के काल के चंद्रभान ब्राह्मण फारसी के प्रारंभिक हिंदी लेखकों में थे। औरंगजेब ने भी हिंदू विद्वानों से तावारीखें लिखवाई। फारसी, अरबी तथा तुर्की भाषा के अनेक शब्द भारतीय भाषाओं जैसे हिंदी ,बांग्ला, मराठी, गुजराती में अपना लिए गए। इस्लाम का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रभाव हिंदू तथा मुसलमान के सम्मिलित प्रयास से हिंदवी  उर्दू भाषा के जन्म से पड़ा।

 

सामाजिक जीवन, मनोरंजन के साधनों जैसे शिकार, बागवानी, अनेक खेलों पर मुसलमानी प्रभाव पड़ा। ललित कलाओं जैसे स्थापत्य पर विशेष प्रभाव परिलक्षित होता है । हिंदुओं को जो कुछ भी उपयोगी और सुंदर लगा उसे अपनाने में कभी उपेक्षा नहीं की। राजपूत राजाओं ने मुगल स्थापत्य कला के अंगों को अपना लिया ।वृंदावन के अनेक मंदिरों में मुगल स्थापत्य की शैली अल्प मात्रा में परिलक्षित होती है। आमेर नगर की इमारतें, बीकानेर के राजमहल, जोधपुर, ओरछा, दतिया के महलों में मुगल निर्माण शैली का प्रभाव पड़ा। दांतेदार मेहराब, कांच के मोजेक, रंगीन पलस्तर, मूलम्मेदार चूने की पृष्ठभूमि जोड़कर इन राजपूत इमारतों को हिंदू राजाओं की रंगीली ऐश्वर्यपूर्ण आवश्यकताओं के अनुकूल बना लिया गया।

 

मुगल काल चित्रकला का स्वर्ण युग था जिसने भारतीय चित्रकारों को अनेक रूपों में प्रभावित किया। मुगलों के द्वारा भारत में लाये गए चीनी तथा ईरानी चित्रकला शैली का भारतीय शैली से समन्वय हुआ तो भारतीय चित्रकारों हेतु नए क्षेत्र खुल गए। जिसने चित्रकला शैली में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया। चित्रकला के विविध विषयों, तकनीकों तथा अंगों को प्रभावित किया। भारतीय चित्रकारों ने आकृति चित्रण (पोर्ट्रेट पेंटिंग) एवं भित्ति चित्रों को अंकित करने में विशेष श्रेष्ठता प्रदर्शित की। इस इस्लामी चित्रकला के प्रभाव से भारतीय राजपूत चित्रकला शैली पूर्ण रूप से परिवर्तित हो गई तथा कांगड़ा शैली का जन्म उत्तर मुगल काल में होता है।

 

मुगलों ने भारतीय उद्यान कला को भी प्रभावित किया। ज्यामिति के सुंदर डिजाइनों के निकुंज तथा मंडप बनवाए गए जिन्हें आमतौर पर ढलवा सतह पर आठ भागों में बांटकर बनाया जाता था। नहरों, सरोवरों तथा छोटे झरनों के रूप में सिंचाई की उत्तम व्यवस्था की जाती थी। उद्यान के मार्गों के दोनों ओर सतह तक जल लबालब भरा रहता था। मुख्यमंडप प्रायः सबसे ऊंचे सतह पर या सबसे नीचे भाग पर बनाया जाता था ताकि मंडप से हरियाली, निर्झरों का विहंगम दृश्य का आनंद ले सकें।इस उद्यान व्यवस्था को भारत के सभी भागों में अपना लिया गया। इससे सौंदर्य की अनुभूति विकसित हो उठी तथा लोगों में बाग बगीचों का शौक बढ़ गया।

 

संगीत एवं वादन के क्षेत्र में भी हिंदू मुस्लिम समन्वय का आरंभ होता है हिंदू तथा मुसलमान संगीतज्ञों ने एक दूसरे की शैली अपना कर एक विशिष्ट भारतीय शैली का विकास किया। भारतीयों में कव्वाली गजल आदि का अभ्यास आरंभ हो गया। भारतीय वीणा तथा ईरानी तमूरे के मिश्रण से सितार बनी तो भारतीय मृदंग से तबला।

 

हिंदुओं का इस्लाम पर प्रभाव:

भारत में इस्लामी शासन की स्थापना के साथ भारत का बहुसंख्यक हिंदू वर्ग इस्लाम के संपर्क में आता है। कुलीन हिंदु प्रशासन एवं सैन्य संचालन में सम्मिलित कर लिए गए तथा अनेक निम्न वर्ग हिंदू धर्मांतरित कर लिए गए। अनेक हिंदू स्त्रियों से मुसलमान शासकों ने विवाह किया। इस तरह से भारत के अनेक उच्च तथा निम्न वर्ग हिंदू इस्लाम से प्रभावित हुए तो उसे प्रभावित भी किया। धर्मांतरित हिंदू अपने साथ हिंदू रीति-रिवाज भी साथ ले गए। हैवेल के अनुसार हिंदू माता ने तुर्कों और मुगलो की उग्रता को शांत किया। हिंदू मुसलमान अपनी परंपराओं को पूरी तरह से भुला नहीं सके। संतो दरगाहों की पूजा करना हिंदुओं के देवी देवताओं की पूजा करने का ही रूप है इसी तरह हिंदू त्योहारो ने भी मुसलमान त्योहारों को प्रभावित किया। शबे बारात का त्योहार शिवरात्रि के हिंदू त्यौहार की तरह रात्रि जागरण करके शोरगुल के साथ मनाया जाने लगा ।हिंदुओं के मुंडन एवं विद्यारंभ से प्रेरित होकर मुसलमान अकीका तथा बिस्मिल्ला का उत्सव आरंभ कर लिया। सूफियों पर वेदांत का प्रभाव पड़ा तथा प्रारंभ में सादगी पूर्ण इस्लाम में भ्रमात्मक विश्वास आ गए। वे हिंदू ज्योतिष, चिकित्सा, आयुर्वेद, योग से प्रभावित हुए बिना ना रह सके। हिंदुओं की पगड़ी, चीरा, राजपूतों से छत्र को अपना लिया गया। इस्लाम में अंगूठियां, हार , कानों के आभूषण आदि पहनना वर्जित था, किंतु उच्च वर्गीय मुसलमान इन्हें धारण करने लगे थे। उच्च वर्ग के मुसलमान भारतीय महीन सूती, मलमल एवं रेशमी वस्त्रों को धारण करना सीख गए जो अपने देश में मोटे तथा मामूली वस्त्रो का प्रयोग करते थे। हिंदू पकवान मिष्ठान तथा हिंदू पाक कला की अनेक बातों को अपना लिया गया। पान खाना उनमें बहुत जनप्रिय हो चुका था। डॉ. वहीद मिर्जा के अनुसार भारत के कलंदरों एवं फकीरों जैसे साधू सन्यासियों का यह प्रभाव हुआ की सरल शुद्ध इस्लाम, बाह्य धार्मिक कर्तव्यों (तकलीफ -ए-शरिया) पर जोर दिया जाता था, अब एक मिश्रित भक्ति संप्रदाय बन गया, जिसमें नजर का भ्रमात्मक विश्वास, आध्यात्मिक गुरु के प्रति आस्था का समावेश हो गया।

 

हिंदू रीति रिवाज ने मुस्लिम नैतिकता पर व्यापक प्रभाव डाला। मुसलमान की बहु विवाह की प्रथा में अल्प परिवर्तन आया तथा वह भी चार स्त्रियां रखने से विमुख होने लगे। इस्लाम में जातिगत भेद नहीं था जबकि भारत में जब वह आए यहां का समाज विभिन्न वर्ग तथा जातियों में विभक्त पाया। भारतीयों के प्रभाव से इस्लाम में भी कई वर्ग बन गए जैसे सैयद, शेख, पठान, मुगल इत्यादि। मुसलमान भी अपने वर्ग तथा जाति में ही विवाह आरंभ कर देते हैं। इनमें भी छुआछूत की प्रथा आ गई। निम्न वर्ग के धर्मान्तरित हिंदू मुसलमान के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार आरंभ कर दिया गया।

 

विदेशी मुसलमान जो इस्लामी स्थापत्य कला लेकर आए थे वह हिंदू कला परंपरा के संपर्क में आकर इंडो -इस्लामिक तथा इंडो-सारसिनिक शैली में परिवर्तित हो गई। मुस्लिम शासको द्वारा निर्मित इमारत के निर्माण में संलग्न मजदूर वर्ग हिंदू था। जिसने अनेक परिवर्तन के बाद भी पारंपरिक हिंदू वास्तुकला शैली के अंश मुस्लिम स्थापत्य कला में छोड़ दिए। इसी तरह चित्रकला तथा संगीत एवं अन्य ललित कलाओं में भी रचनात्मक परिवर्तन हो गए। यद्यपि इस्लामी शासको द्वारा दरबारी तथा साहित्यिक भाषा फारसी ही रखी तथापि स्थानीय भाषाओं के संपर्क से एक नवीन भाषा हिन्दवी (उर्दू) का जन्म हुआ। उच्च वंशीय मुसलमान परिवारों में विशुद्ध हिंदू परंपरा सती और जौहर को अपना लिया गया। भटनीर का गवर्नर कमालुद्दीन अपनी सारी संपत्ति तथा स्त्रियों को जलाकर तैमूर से युद्ध लड़ने गया। देश में प्राचीन काल से प्रचालित भूमिदान परंपरा को तुर्कों तथा मुगलों में भी जारी रखा। तथा इन भूमि दानों को इक्ता, मनसब, मदद-ए-माश, मिल्क, इनाम, नजराना आदि कहा गया। मुसलमान शासको ने देवोत्तर तथा ब्रह्मेत्तर दान देने का प्राचीन चलन कायम रखा।  मुसलमान शासको द्वारा आरंभ की गई विधि व्यवस्था भी हिंदू विधि प्रणाली के समान धार्मिक प्रमाणिक ग्रंथों तथा भाष्यों के उद्धरण पर आधारित थे। हिंदू विधि व्यवस्था धर्मशास्त्र पर तो मुसलमान विधि प्रणाली कुरान पर आधारित थी। दोनों ही प्रणालियों में राज्य द्वारा कानून बनाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। इस तरह से मुसलमान आचार- विचार ,तौर-तरीके, रीति-रिवाज, धर्म-परंपराओं में हिंदुओं ने व्यापक प्रभाव डाला।

 

टिट्स का कथन उपयुक्त जान पड़ता है:-

’’सब कुछ कहने के पश्चात भी इसमें तनिक ही संदेह रह जाता है कि, हिंदू धर्म में, जो कि अभी भी अपनी सूस्थिर मार्ग पर आश्चर्यजनक संतोष और विश्वास से बढ़ता जाता है, इस्लाम पर, अपने ऊपर इस्लाम के प्रभाव की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभाव डाला है ।’’

 

क्षेत्रीय स्तर पर समन्वय:

हिंदू तथा इस्लाम का संबंध व्यापक स्तर में सल्तनत काल तथा मुगल काल में संपन्न होता है। दिल्ली की केंद्रीय शक्तियों के अधीन  यह समन्वय हो रहा था, किंतु अल्प रूप में यह क्षेत्रीय स्तर पर भी भारत के विभिन्न भागों में मिलता है। दक्षिण भारत में समकालीन विजयनगर साम्राज्य तथा बहमनी सल्तनत के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ।  यहां दक्कन के सूफी संतों तथा स्थानीय हिंदू भक्ति परंपराओं का मिश्रण देखा गया। बंगाल में सूफी संतों तथा वैष्णव भक्ति परम्पराओं (चौतन्य महाप्रभु) का समन्वय हुआ। बंगाली साहित्य में हिंदू तथा इस्लामी तत्वों का मिश्रण मिलता है। गुजरात, राजस्थान में व्यापार तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कारण हिंदू इस्लामी समन्वय स्थानीय कला, वास्तुकला तथा लोक परंपराओं में दिखता है। 8वीं शताब्दी में 712 ई. मोहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में सिंध पर अरब विजय के साथ इस्लाम भारत में प्रविष्ट हुआ था। अरब व्यापारियों ने गुजरात, मालाबार तथा दक्षिणी तटों पर स्थानीय हिंदू समुदायों के साथ सर्वप्रथम व्यापारिक संबंध स्थापित किया था। अरब व्यापारियों ने स्थानीय भाषाओं, भोजन और वस्त्र परंपराओं को अपनाया। जैसे मालाबार तट पर मसाले के व्यापार ने सांस्कृतिक मिश्रण को बढ़ावा दिया। अरब यात्री सुलेमान-अल-ताजिर के यात्रा वृतांतों में हिंदू तथा मुस्लिम व्यापारियों के मध्य सहयोग तथा समन्वय का उल्लेख मिलता है।

 

भक्ति एवं सूफी आंदोलनों द्वारा धार्मिक सांस्कृतिक समन्वय:

प्रारंभिक मुस्लिम शासको की नीतियों के कारण भारत के हिंदुओं में उनके विरुद्ध घृणा तथा द्वेष के भाव उत्पन्न कर दिए थे। हिंदू तथा मुसलमान एक दूसरे के संपर्क में आने के बजाय म्लेच्छ एवं काफिर कहकर एक दूसरे को संबोधित करते थे। दोनों का रहन-सहन, आचार विचार ,वेशभूषा तथा रीति रिवाज सर्वथा भिन्न थे ।परिणामस्वरूप शासक तथा शासित वर्ग के बीच गहरी खाई उत्पन्न हो गई। इस गहरी खाई को पाटने का कार्य भक्ति तथा सूफी संतों द्वारा किया गया। कतिपय सूफी संतों, जिसमें गरीब नवाज मोइनुद्दीन चिश्ती तथा निजामुद्दीन औलिया के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, ने हिंदू मुस्लिम के बीच खाई को पाटने का कार्य किया। भारतीय हिंदू समाज में प्रचलित जातीय भेदभाव तथा उच्च -निम्न की भावना से त्रस्त निम्न वर्ग के हिंदू इस्लाम के भ्रातृत्व के सिद्धांत से प्रभावित होकर धर्म परिवर्तन कर बैठे। इस्लाम में संगीत निषिद्ध होते हुए भी सूफी संतों ने सामूहिक कव्वाली का सहारा लेकर इसे खुदा की आराधना का सरल मार्ग बताया। मोइनुद्दीन चिश्ती ने अपने विचारों का प्रचार जनसाधारण में किया तो सुहारावर्दी सूफी सिलसिले के संतों ने उच्च वर्ग के लोगों को प्रभावित किया था। सूफी संतों ने ईश्वर तक पहुंचने का एकमात्र साधन प्रेम को बताया है। डॉ.ताराचंद ने बताया कि शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन इस्लाम से प्रभावित है। डॉ. एच. कुरैशी, डॉ खलीक अहमद निजामी भक्ति आंदोलन का आरंभ मुस्लिम संपर्क के कारण मानते हैं। इसके विपरीत डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव के अनुसार भक्ति आंदोलन हिंदू धर्म के संपर्क का पहला परिणाम नहीं है। डॉ. आर.जी. भंडारकर के अनुसार यह आंदोलन भागवत गीता की शिक्षाओं पर आधारित था। ऋग्वेद की पहली ऋचा में एक ब्रम्ह की उपासना का उल्लेख है ’’एकम् सदप्रिया बहुदा वदंति’’। इसलिए डॉ.सेन ने लिखा है कि ’’एक ब्रह्म की उपासना ,जो इस्लाम धर्म का प्राण समझी जाती है और जिसने भक्ति आंदोलन में प्राण फूंके थे ,वह भारतीयों को अज्ञात नहीं थी। हिंदू धर्म प्रचारकों ने मुसलमान आगमन से बहुत पहले परम ब्रह्म के ज्ञान का उपदेश दिया था।’’ इस्लामी राज्य में मंदिरों मूर्तियों को तोड़ा जा रहा था। ऐसे समय हिंदुओं के द्वारा मूर्तियों की आराधना के बजाय भक्ति मार्ग को मोक्ष की प्राप्ति के साधन के रूप अपनाया गया। आर्थिक रूप से कमजोर हो चुके हिंदुओं हेतु कर्मकांड का अनुसरण कठिन होता जा रहा था। इस्लामी धर्मांतरण से निम्न जाति वर्ग को बचाने जाति व्यवस्था शिथिल की गई। मध्यकालीन भक्ति आंदोलन कर्मकांड ,मूर्ति पूजा ,अंधविश्वास तथा जाति व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह का प्रतीक माना जाता है। भक्ति की विचारधारा भारतीय थी, लेकिन इसका प्रारंभ सल्तनत काल में 14वीं शताब्दी के बाद से हुआ था। डॉ. सेन के अनुसार ’’मुस्लिम संपर्क के कारण इस भावना के प्राचीर को प्रोत्साहन मिला था। ’’भक्ति आंदोलन के संतों ने सूफी संतो के समान ईश्वर की सत्ता को मना है। वे एकेश्वरवादी थे। सभी संतो ने पूजापाठ, व्रत, मूर्तिपूजा, जाति-पाति, सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। भक्ति आंदोलन के संत केवल हिंदू नहीं थे, कबीर जुलाहे थे तो मलिक मोहम्मद जायसी मुसलमान थे। कुछ संत निम्न जाति वर्ग से भी थे। इन संतों ने धार्मिक तथा जातिगत मतभेद को दूर कर सांस्कृतिक तथा धार्मिक समन्वय की प्रक्रिया को बल प्रदान किया।

 

आधुनिक काल में हिंदू मुस्लिम समन्वय:

यूरोपीय शक्तियों पुर्तगाल, डच ,फ्रांसीसी एवं अंग्रेजों के भारत आगमन के साथ हिंदू मुस्लिम समन्वय की प्रक्रिया बहुत हद तक कमजोर हो गई। अंग्रेजों ने भारत में औपनिवेशिक शासन के आरंभिक काल में मुस्लिम शासको के विरुद्ध तथा हिंदुओं के प्रति सहानुभूति की भावना रखी 1857 ई. की क्रांति में हिंदू तथा मुसलमान ने अंग्रेजों के विरुद्ध संयुक्त संघर्ष किया। इस क्रांति के बाद अंग्रेजों ने हिंदू तथा मुसलमान में फूट डालो और शासन करो की नीति आरंभ कर दी, जिसमें समन्वय की प्रक्रिया को बाधित किया तथा दोनों संप्रदायों के बीच की खाई को और गहरा कर दिया। फिर भी सांस्कृतिक समन्वय जारी रहा विशेष रूप से साहित्य तथा कला के क्षेत्र में। आधुनिक काल में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू तथा मुस्लिम नेताओं जैसे गांधी जी, मौलाना आजाद ने एकता पर जोर दिया। उर्दू साहित्य, बॉलीवुड तथा लोक परंपराओं में हिंदू-मुस्लिम समन्वय आज भी देखे जा सकते हैं।

 

चुनौतियों तथा सीमाएं:

हिंदू मुसलमान समन्वय के प्रमाण साहित्य, कला ,सामाजिक रीति रिवाज आदि में मिलते हैं ,तथापि यह सर्वमान्य सत्य है कि हिंदू तथा मुसलमान एक जाति के रूप में कभी घुलमिल नहीं पाए। दोनों ही संप्रदाय भारत भूमि में स्वतंत्र अस्तित्व के साथ खड़े रहे। यह माना जाता है की यूनानी, शक, कुषाण को अपने धर्म में आत्मसात करने वाले हिंदुत्व ने इस्लाम को अपने में मिलने का कोई प्रयास नहीं किया। हिंदुओं में मुसलमान के साथ खान-पान एवं विवाह आदि करने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। किंतु यह मत उपयुक्त नहीं है, लिखित प्रमाणों के आधार पर विदित होता है कि देश में अरब तथा तुर्क के आगमन के प्रारंभिक दिनों में हिंदू शासको तथा हिंदू जनता ने उनके साथ उदार व्यवहार किया। दक्षिण भारतीय शासकों ने भारत आए अरब व्यापारियों को न केवल व्यापारिक सुविधा दी अपितु हिंदू धर्मावलंबियों को अपना धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपनाने हेतु भी प्रोत्साहित किया। कालीकट के जमोरिन ने यह आदेश दिए थे किष् उनके राज्य में रहने वाले मछुआरों के प्रत्येक कुटुंब में से एक या अधिक पुरुष सदस्य का मुसलमान बनाकर पालन पोषण किया जाना चाहिए।’’

 

हिंदू राजाओं द्वारा यूरोपीय व्यापारियों की तरह अरबों को भी वाणिज्यिक सुविधा प्रदान की गई थी जो कि यहां के स्वदेशी व्यापारी वर्ग को भी प्राप्त नहीं थी। न केवल विदेशी मुसलमान को सम्मान और आदर दिया गया अपितु धर्मांतरित हिंदुओं के प्रति भी आदर भावना प्रदर्शित किया गया जो कि हिंदू निम्न जाति वर्ग के प्रति व्यवहार से कहीं बेहतर था। किंतु हिंदुओं द्वारा विदेशियों को समुचित सौहार्द्रता खानपान एवं अंतर्विवाह के क्षेत्र में प्रदर्शित नहीं हुआ। इसका कारण था हिंदू सामान्यतः शाकाहारी थे मांसाहारी हिंदू भी गौ मांस से घृणा करते थे इसके विपरीत मुसलमान लगभग शत प्रतिशत मांसाहारी एवं सामिष भोजी थे। गो हत्या तथा गो मांस भक्षण को वे धार्मिक कृत्य समझ त्यागने को तैयार न थे। वे अपनी श्रेष्ठता तथा उच्चता में विश्वास करते थे तथा हिंदुओं को तुच्छ, अशक्त तथा अप्रगतिशील जाति कहकर तिरस्कृत करते थे। मोहम्मद साहब के संदेश को गैर मुसलमानों के समक्ष रखने तथा उनका धर्मांतरण करना अपना धार्मिक कृत्य समझते थे। विजेताओं के अभिमान से भरे मुसलमान जातिप्रथा में जकड़े समाज में स्वयं को विलीन नहीं करना चाहते थे। धर्मांतरित भारतीय मुसलमान के हिंदू धर्मांतरण की इच्छा प्रकट करने पर मौत की सजा दी जाती थी। यदि कोई हिंदू यह प्रचारित करता कि हिंदू तथा इस्लाम दोनों सच्चे धर्म है तो उसे भी प्राण दंड दिया जाता था। कुरान के आदेशानुसार किसी गैर मुसलमान से विवाह की अनुमति तब तक नहीं थी जब तक वह धर्म परिवर्तन कर मुसलमान न बन जाए। कुरान में निर्धारित है-

 

’’वह परिचारिका जो इस्लाम में विश्वास करती है मूर्ति पूजक स्त्री से अच्छी है भले ही वह आपको रिझाती हो और एक भृत्य जो सच्चा विश्वासी है मूर्तिपूजक से अच्छा है चाहे वह आपको ज्यादा रुचिकर क्यों न लगता हो।’’

 

कुरान के आदेश अनुसार मुसलमान को अपने गैर मुसलमान पूर्वजों के प्रति कोई सम्मान आदर प्रदर्शित करना निषिद्ध था कुरान के अनुसार-

 

’’ना तो पैगंबर साहब को और न उनको जो वास्तविक विश्वासी हैं यह इजाजत है कि वह मूर्ति पूजकों के लिए यह जानने के बाद भी प्रार्थना करें कि वह नरक के निवासी हैं चाहे वे अपने कुटुंबीजन ही क्यों ना हों।’’

 

कुरान के इस निषेधाज्ञा ने भारतीय मुसलमान के लिए यह असंभव कर दिया कि वह अपने हिंदू पूर्वजों के साथ कोई भी संबंध रख सकें अथवा इस देश के प्राचीन इतिहास में समुचित गर्व का अनुभव कर सकें।

 

कुरान के आदेश अनुसार-’’ऐ सच्चे विश्वासियों ऐसे व्यक्तियों को अपने मित्र ना मानो जिनको तुमसे पूर्व ही धर्म ग्रंथ प्राप्त हो चुके हैं अथवा जो ईश्वर के प्रति कृतघ्न या काफिर हैं और जो तुम्हारे धर्म की हंसी उड़ाते या मजाक बनाते हैं।’’

 

कुरान के इस आदेश का संदर्भ देते हुए मुसलमान धर्मज्ञ रफीउद्दीन ने शेरशाह सूरी द्वारा रायसेन के राजा पूरणमल को दिए सुरक्षा आश्वासन से मुक्त होने की सलाह दी थी। इस शिक्षा के अनुसार गैर मुसलमान के साथ कोई भी आश्वासन नहीं निभाना चाहिए।

 

तुर्क अफगान लोगों ने स्वयं को परस्पर खान पान से बहिष्कृत रखा जाना बुरा नहीं माना अपितू इसे अपने लाभ में परिवर्तित कर लिया। वर्जित भोजन ग्रहण किये हिंदू धर्मभ्रष्ट घोषित हो जाते। ऐसे धर्मभ्रष्ट हिंदुओं का अंततः धर्मांतरण कर लिया जाता था। इस तरह से भारत के शासको, धर्मसुधारकों तथा जनसाधारण द्वारा नवागंतुकों के साथ एकता तथा समन्वय स्थापित करने के प्रयास असफल सिद्ध हुए।

 

निष्कर्ष:-

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि इस्लाम में हिंदू सभ्यता के विविध पक्षों पर कुछ ना कुछ प्रभाव डाला दूसरी ओर मुसलमान भी हिंदू सभ्यता से बहुत अधिक प्रभावित हुए। संतो दरगाहों की पूजा, त्यौहारों में उत्साह रात्रि जागरण, जातिप्रथा, वस्त्र आभूषण आदि से मुस्लिम प्रभावित हुए। हिंदू वेदांत ने सूफी संतों को प्रभावित किया। सतीप्रथा, जोहर जैसे हिंदू प्रथाओं को उच्च वर्ग के मुसलमानों ने अपना लिया। मुसलमान सनातन ज्योतिषशास्त्र, औषधीशास्त्र से प्रभावित हुए। इसी तरह से इस्लाम ने भी भारत के राजनीति,कला, साहित्य एवं संस्कृति को प्रभावित किया। युद्ध कला में तोप- बारूद का प्रयोग, उर्दू हिंदवी भाषा के विकास में, इंडो- इस्लामिक स्थापत्य शैली के विकास में समन्वय परिलक्षित होता है। किंतु इस्लाम का प्रभाव आर्थिक तथा धार्मिक क्षेत्र में कम था। कृषि तथा उद्योग व्यापार में मुसलमानों को ना रुचि थी ना ही उनके पास समय था। यद्यपि वे हिंदुओं की जमीन छीन लिए किंतु किसान हिंदू ही रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि आर्थिक क्षेत्र में हिंदू बचे रहे। मुसलमान शासनकाल में भारत का व्यापार मुस्लिम देशों के साथ बढा। हिंदू धार्मिक रीति रिवाज, कर्मकांड में किसी भी तरह का परिवर्तन करने में इस्लाम असफल रहा। हिंदू धर्म तथा संस्कृति में कोई आमूल परिवर्तन नहीं हुआ। दोनों संस्कृतियों के समन्वय सम्मिश्रण तथा सामंजस्य के बावजूद भी भारत में हिंदुओं तथा मुसलमानों ने अपनी विशिष्टता बनाए रखी जो आज भी दोनों के सामाजिक, धार्मिक परंपराओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

 

संदर्भ सूची :-

1.    के.सी. श्रीवास्तव, प्राचीन भारत का इतिहास तथा संस्कृति, पृष्ठ क्र. 875 -79, 8832.  

2.    आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव, मध्यकालीन भारतीय संस्कृति, पृष्ठ क्र. 220-31

3.    डॉ राजीव दुबे, भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का विकास, पृष्ठ क्र. 110-13

4.    वी.डी. महाजन, दिल्ली सल्तनत का इतिहास, पृष्ठ क्र. 366-71

5.    हरिश्चंद्र वर्मा, मध्यकालीन भारत (1540 1761 ई.), पृष्ठ क्र 543-44

6.    डॉ विश्वेश्वर स्वरूप भार्गव, डॉ श्रीमती नीलिमा भार्गव, मध्यकालीन भारतीय इतिहास (1000 से 1761 ई) पृष्ठ क्रमांक 345-51

7.    रामशरण शर्मा, पूर्व मध्यकालीन भारत का सामंती समाज और संस्कृति, पृष्ठ क्रमांक 36

8.    डॉ सत्यनारायण दुबे, यूनिफाइड हिस्ट्री, पृष्ठ क्रमांक 220 -23

9.    गूगल आरती श्रीवास्तव

10.   Grok AI

 

 

Received on 30.11.2025      Revised on 29.12.2025

Accepted on 21.01.2026      Published on 17.03.2026

Available online from March 20, 2026

Int. J. Ad. Social Sciences. 2026; 14(1):56-62.

DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00013

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